एक अरसे से
कितना अरसा गुज़र गया
किसी सहेली ने आकर पीछे से आँखें नहीं मींची मेरी कितना अरसा गुज़र गया
किसी दोस्त ने मिलने को दिवार नहीं टापी मेरी
दिल तो भरा कयीं बार इतने अरसे में मगर कबसे आँखें नहीं भरी मेरी
कितना अरसा गुज़र गया पुराने घर गए
कितना अरसा गुज़र गया पड़ोस भर को नमस्ते किए हुए
नमस्ते आंटी ,नमस्ते अंकल कहते कहते घर तक पहुँच जाते थे
जीते रहो खुश रहो ऐसी दुआएँ संग बटोर लाते थे
कितना अरसा बीत गया , वो सड़क चलती दुआओं की झोली नहीं भरी मेरी
दिल तो भरा कयीं बार इतने अरसे में मगर कबसे आँखें नहीं भरी मेरी
माँ की साड़ियाँ दादी की अंगूठी पहनने को अगर मिल जाती थी
ज़िंदगी की सारी सजावट की खाविशें मानो पूरी हो जाती थी
हल्की सी बिंदी और थोड़े से काजल से पूरा हो जाया करता था श्रिंगार
इतनी सुंदर तबसे अब तक कभी सूरत नहीं लगी मेरी
दिल तो भरा कयीं बार इतने अरसे में मगर कबसे आँखें नहीं भरी मेरी

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